Words Reflect My Life.
गुस्ताखी हमने की नही
ख़ता शायद हो गई
रात को हम जगह रहे,
सुबह शायद सो गई
सपनो में हम उलझे रहे
शख्सियत सवालों में खो गई
होश आया तो मझधार में पाया
अब तो काफ़ी देर हो गई
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