Monday, July 8, 2024

दुविधा

 गुस्ताखी हमने की नही  

ख़ता शायद हो गई 


रात को हम जगह रहे, 

सुबह शायद सो गई 


सपनो में हम उलझे रहे 

शख्सियत सवालों में खो गई 


होश आया तो मझधार में पाया  

अब तो काफ़ी देर हो गई 

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