Saturday, June 6, 2020

बागी ज़िन्दगी

मैं बना था, बन के टूटा हूं
टूट कर गिरा हुं

गिर कर जुड़ा ुहं
जुड़ कर फिर बना हुं

इस बार कुछ कमी है, अधूरा ुहं
दुनिया को रंग देख सकूं, कुछ पूरा ुहं

सफ़ेद रंग था ज़ेहन में, वह दागी है
ठहराव नहीं है ज़िन्दगी, यह तो बागी है

आंख बंद विश्वास मत कर रे दोस्त
पछताएगा अपने कदमों से, देगा कोस

रात का स्वेर से ज़िक्र हमेशा रहेगा
भ्विष्य इन दिनों को भी जिए गा

कुछ खो कर कुछ हासिल ना हुआ
माना था जिसे ईमान, वोह था जुआ

संतोष की लूट तो हो चुकी है
हंसी इन होठों से अब खो चुकी है

समर सुधा

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